भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 की रात केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि भारतीय गणराज्य की आत्मा की परीक्षा के रूप में दर्ज है। उस रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल ने नागरिक स्वतंत्रताओं, प्रेस की आज़ादी, राजनीतिक असहमति और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर अभूतपूर्व दबाव डाला था। लोकतंत्र के सभी स्तम्भ अपनी जगह थे लेकिन लोकतंत्र की आत्मा घायल थी। सत्ता और राष्ट्र के बीच की रेखा धुँधली हो चुकी थी।
आपातकाल को अक्सर एक ऐतिहासिक घटना के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उसका महत्व केवल अतीत तक सीमित नहीं है। वह भारतीय लोकतंत्र के सामने बार-बार खड़े होने वाले उन सवालों की याद दिलाता है जो हर दौर में नए रूपों में लौटते हैं। क्या असहमति लोकतंत्र की शक्ति है या खतरा? क्या संस्थाएँ व्यक्तियों से बड़ी हैं? क्या किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति लोकतंत्र और संविधान से बड़ा है? क्या संविधान केवल शासन का दस्तावेज़ है या सत्ता पर नियंत्रण का भी माध्यम है? और क्या लोकतंत्र केवल चुनावों से सुरक्षित रह सकता है?
दरअसल, लोकतंत्र पर संकट हमेशा संविधान के औपचारिक निलंबन या आपातकाल की घोषणा के रूप में ही नहीं आता। कई बार वह संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण या अप्रासंगिक कर दिए जाने, सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण, नागरिक स्वतंत्रताओं के संकुचित होते जाने और सार्वजनिक विमर्श के सीमित होते दायरे के रूप में सामने आता है। इसलिए आपातकाल केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि लोकतंत्र को समझने की एक स्थायी कसौटी है। इसलिए हमें इसे इस नजरिये से भी देखने की ज़रूरत है।
उस दौर में कुछ ऐसे नेता भी उभरे जिन्होंने सत्ता के दबाव के बावजूद लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा को अपना दायित्व माना। उन नेताओं में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का नाम विशेष महत्व रखता है।
सत्ता का केंद्रीकरण और लोकतंत्र का संकट
चन्द्रशेखर उन विरले नेताओं में थे जिन्होंने सत्ता की निकटता से अधिक लोकतंत्र की गरिमा को महत्व दिया। वे उस समय कांग्रेस के सांसद थे, लेकिन सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण के आलोचक भी थे। यही कारण था कि आपातकाल के दौरान उन्हें भी जेल भेजा गया। यह विडंबना ही थी कि अपनी ही पार्टी की सरकार के दौर में एक सांसद को लोकतांत्रिक असहमति की कीमत चुकानी पड़ी।
चन्द्रशेखर का संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं था। वह उस राजनीतिक प्रवृत्ति के विरुद्ध था जो राज्य और सरकार को राष्ट्र का पर्याय मानने लगती है। उनकी राजनीति का मूल विश्वास था कि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, संस्थागत संतुलन, नैतिक राजनीति और सत्ता की जवाबदेही है।
लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है असहमति
आपातकाल के अनुभवों को दर्ज करते हुए चन्द्रशेखर ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘मेरी जेल डायरी’ में सत्ता, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता के सवालों पर गंभीर चिंतन किया। उनकी चिंता केवल तत्कालीन परिस्थितियों तक सीमित नहीं थी। वह लोकतंत्र के चरित्र पर विचार कर रहे थे।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान क्या है? बहुमत? चुनाव? सरकार? चन्द्रशेखर के लिए इसका उत्तर था- असहमति का अधिकार।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने कहा था-
“लोकतंत्र में जनता मालिक होती है, सरकार नहीं।”
यह वाक्य उस पूरे संघर्ष का सार था। लोकतंत्र की शक्ति इस बात में नहीं है कि सरकार कितनी मजबूत है, बल्कि इस बात में है कि नागरिक कितनी स्वतंत्रता के साथ सरकार से असहमति व्यक्त कर सकते हैं।
आपातकाल ने इसी अधिकार को सबसे अधिक चुनौती दी। प्रेस पर सेंसरशिप, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियाँ और नागरिक अधिकारों पर अंकुश ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या लोकतंत्र केवल चुनावों से जीवित रह सकता है? चन्द्रशेखर का उत्तर स्पष्ट था- नहीं। लोकतंत्र की सांस असहमति से चलती है और जब असहमति को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगे, राष्ट्रद्रोह से जोड़ा जाने लगे तो लोकतंत्र एक दिखावा भर रह जाता है।
संविधान : केवल कानून नहीं, एक नैतिक अनुबंध
भारतीय संविधान को अक्सर एक कानूनी दस्तावेज़ के रूप में देखा जाता है, जबकि उसके निर्माताओं ने उसे नागरिक स्वतंत्रताओं और मानवीय गरिमा की रक्षा का उपकरण माना था।
संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने चेतावनी दी थी-
“संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे तो वह बुरा सिद्ध होगा।”
यह चेतावनी आपातकाल के दौरान भयावह रूप से प्रासंगिक हो उठी. संविधान की धाराएँ बनी रहीं, लेकिन उनका लोकतांत्रिक आशय संकट में पड़ गया।
आंबेडकर ने एक और महत्वपूर्ण बात कही थी-
“यदि हमें लोकतंत्र को केवल रूप में नहीं बल्कि व्यवहार में भी बनाए रखना है, तो हमें संवैधानिक तरीकों का परित्याग नहीं करना चाहिए।”
चन्द्रशेखर इसी संवैधानिक नैतिकता के पक्षधर थे। वे मानते थे कि संविधान केवल राज्य को शक्ति देने का दस्तावेज़ नहीं है बल्कि वह राज्य की शक्ति पर नियंत्रण लगाने का भी दस्तावेज़ है। वह नागरिक और राज्य के बीच एक नैतिक अनुबंध है, जिसके केंद्र में स्वतंत्रता, समानता और न्याय के मूल्य हैं।
गांधी का स्वराज और लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण
चन्द्रशेखर की राजनीतिक दृष्टि पर गांधी का प्रभाव गहरा था। वे मानते थे कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में लोकतंत्र तभी जीवित रह सकता है जब सत्ता का विकेंद्रीकरण हो।
महात्मा गांधी ने लिखा था-
“सच्चा लोकतंत्र केंद्र में बैठे कुछ व्यक्तियों द्वारा नहीं चलाया जा सकता; उसे नीचे से, जनता के बीच से निर्मित होना चाहिए।”
गांधी के ग्राम स्वराज का अर्थ केवल पंचायत चुनाव नहीं था। उसका अर्थ था कि निर्णय लेने की शक्ति जनता तक पहुँचे, समाज आत्मनिर्भर बने और सत्ता नीचे से ऊपर की ओर निर्मित हो।
चन्द्रशेखर इसी विचार को आधुनिक भारत में पुनर्स्थापित करना चाहते थे। उनके लिए आपातकाल केवल नागरिक अधिकारों का संकट नहीं था बल्कि वह सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण का परिणाम भी था। उनका विश्वास था कि जब निर्णय लेने की शक्ति कुछ व्यक्तियों या संस्थाओं में सिमट जाती है तो लोकतंत्र धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाता है।
लोकतंत्र का स्वभाव विकेंद्रीकरण है, जबकि निरंकुशता का स्वभाव केंद्रीकरण।
व्यक्तिपूजा, सत्ता और लोकतंत्र
भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक व्यक्तिपूजा की प्रवृत्ति रही है। संविधान सभा में आंबेडकर ने चेताया था-
“राजनीति में भक्ति या व्यक्तिपूजा अंततः तानाशाही का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।” चन्द्रशेखर की राजनीति इस चेतावनी की व्यावहारिक अभिव्यक्ति थी। उन्होंने किसी भी राजनीतिक नेतृत्व को लोकतांत्रिक संस्थाओं से ऊपर रखने का विरोध किया। वे मानते थे कि व्यक्ति चाहे कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो, लोकतंत्र में उसकी शक्ति संविधान और संस्थाओं की सीमाओं के भीतर ही रहनी चाहिए।
उनका संघर्ष किसी एक नेता से नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति से था जिसमें संस्थाओं की जगह व्यक्तियों को सर्वोच्च बना दिया जाता है।
लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण और चंद्रशेखर की दृष्टि
चन्द्रशेखर का लोकतंत्र केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं था। वे सामाजिक और आर्थिक न्याय को भी लोकतंत्र का अनिवार्य आधार मानते थे।
हम इसको आंबेडकर के संविधान सभा में दिए इस वक्तव्य से समझते हैं जिसमें उन्होंने कहा कहा था कि, “26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश करेंगे। राजनीति में समानता होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी।”
यह चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। चन्द्रशेखर का समाजवाद इसी विरोधाभास को दूर करने का प्रयास था। वे मानते थे कि यदि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ आर्थिक लोकतंत्र नहीं होगा तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का नैतिक आधार कमजोर पड़ जाएगा।
इसीलिए वे गांधी की तरह ग्रामीण भारत, किसानों, श्रमिकों और वंचित समुदायों के सवालों को लोकतंत्र के केंद्र में रखने की बात करते थे। वह सत्ता के केंद्रीयकरण की बजाय विकेंद्रीकरण की बात करते थे।
आपातकाल और लोकतंत्र की वर्तमान चुनौतियाँ
आपातकाल का महत्व इतिहास की एक घटना भर नहीं है। उसका महत्व इस बात में है कि वह हमें लोकतंत्र के प्रति लगातार सजग रहने की सीख देता है। लोकतंत्र पर संकट हमेशा आपातकाल जैसी औपचारिक घोषणा के रूप में नहीं आता बल्कि वह संस्थाओं के क्रमिक क्षरण, राजनीतिक केंद्रीकरण और सार्वजनिक विमर्श के गायब होते जाने के रूप में भी सामने आ सकता है।
आज भारतीय लोकतंत्र के सामने कुछ ऐसे सवाल खड़े हैं जिन पर गंभीर विचार आवश्यक है। पिछले वर्षों में निर्वाचित सरकारों के गिरने, विधायकों और सांसदों के बड़े पैमाने पर दल-बदल, राजनीतिक दलों के विभाजन तथा चुनावी जनादेश की पुनर्व्याख्या को लेकर व्यापक बहस हुई है या हो रही है। दल-बदल विरोधी कानून होने के बावजूद राजनीतिक निष्ठाओं के अचानक बदल जाने की घटनाओं ने लोकतांत्रिक जनादेश की प्रकृति पर सवाल खड़े किए हैं।
लोकतंत्र में जनता किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि विचार, कार्यक्रम और राजनीतिक प्रतिबद्धता को भी वोट देती है। यदि वही जनादेश बाद में राजनीतिक जोड़-तोड़ का विषय बन जाए तो राजनीतिक नैतिकता ही नहीं लोकतंत्र भी कमजोर होता है।
इसी प्रकार चुनावी प्रक्रिया और चुनावी संस्थाओं को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष चुनाव होना पर्याप्त नहीं है। जनता को निष्पक्षता पर विश्वास भी होना चाहिए। चुनाव आयोग, न्यायपालिका, संसद, सूचना आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, विश्वविद्यालय, स्वतंत्र मीडिया और नागरिक समाज जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता लोकतंत्र की वास्तविक पूँजी होती है। इन संस्थाओं पर उठने वाले सवालों का पारदर्शी और प्रामाणिक उत्तर देना लोकतंत्र की मजबूती का प्रमाण है। मौजूदा सरकार ऐसा करने में पूरी तरह से विफल रही है।
आज हमारे लोकतंत्र के सामने कई नई चुनौतियाँ हैं जिनमें दुष्प्रचार, सूचना का केंद्रीकरण, जनमत को प्रभावित करने वाले संगठित अभियान, चुनावी वित्तपोषण में बढ़ती अपारदर्शिता, संवैधानिक संस्थाओं के साथ मीडिया का दुरुपयोग और सार्वजनिक विमर्श का ध्रुवीकरण शामिल हैं।
यदि चन्द्रशेखर आज होते तो संभवतः उनकी चिंता किसी एक दल या सरकार से अधिक ऐसी राजनीतिक प्रवृत्ति को लेकर होती।
लोकतंत्र की रक्षा हर पीढ़ी का दायित्व
आपातकाल का इतिहास केवल दमन का इतिहास नहीं है, बल्कि प्रतिरोध का इतिहास भी है। वह हमें बताता है कि लोकतंत्र एक स्थायी उपलब्धि नहीं, बल्कि निरंतर सजगता की मांग करने वाली व्यवस्था है।
चन्द्रशेखर की राजनीति का महत्व इसी तथ्य में है कि उन्होंने लोकतंत्र को सत्ता प्राप्ति के साधन के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक मूल्य के रूप में देखा। उनकी राजनीति में गांधी का ग्राम स्वराज, अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता और जयप्रकाश नारायण का लोकतांत्रिक प्रतिरोध एक साथ दिखाई देता है।
आज जब सत्ता के केंद्रीकरण, संस्थाओं की स्वायत्तता, चुनावी निष्पक्षता, मीडिया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, और जनादेश को अगुवा करने और संविधान को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तब चन्द्रशेखर की राजनीतिक विरासत इतिहास से निकलकर वर्तमान का सवाल बन जाती है।
क्योंकि लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु केवल तानाशाही नहीं होती, बल्कि वह उदासीनता भी होती है जो धीरे-धीरे नागरिकों को यह विश्वास दिला देती है कि संस्थाएँ स्वयं अपनी रक्षा कर लेंगी।
लेकिन इतिहास का सबक कुछ और है।
लोकतंत्र की रक्षा संसद की दीवारें नहीं करतीं। न ही संवैधानिक संस्थाएं ही करती। सही मायने में लोकतंत्र की रक्षा उन नागरिकों द्वारा होती है जो लोकतंत्र और संविधान के प्रति निष्ठावान होते हैं न कि किसी व्यक्ति विशेष के प्रति।
आपातकाल के अंधकार में चन्द्रशेखर ऐसी ही एक आवाज़ थे और, शायद इसी कारण, पाँच दशक बाद भी, उनकी राजनीति हमें यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल शासन की व्यवस्था नहीं, बल्कि एक संवैधानिक नैतिक जिम्मेदारी है।
(अनिल अत्रि का लेख। लेखक चंद्रशेखर की पत्रिका ‘यंग इंडियन’ के एक दशक तक संपादकीय प्रभारी रहे हैं।कोलाज : पंकज सिंह)